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लाचार बेजुबानों की सुध लेने
वाला कोई नही.......
केदारघाटी तथा बद्रीनाथ
क्षेत्र में चलाये जा रहे रेस्क्यू
आपरेशन में जहां हर जीवित
व्यक्ति को निकालने के लिए
सेना तथा सरकार ने
प्रतिबद्वता दिखायी है
वहीं बेजुबानों की ओर
किसी का ध्यान
नहीं जा रहा है। ये बेजुबान न
अपनी भूख-प्यास का इजहार कर
पा रहे हैं और न ही किसी के
द्वारा इनके जीवन को बचाने के
लिए सरकार पर दबाव
ही बनाया गया। नतीजा अकेले
केदारनाथ और हेमकुंड मार्ग पर
1800 से अधिक घोड़े-खच्चर
पानी के अभाव में तिल-तिलकर
मर रहे हैं। आपदा के 18 दिन होने के
बावजूद इन बेजुवानों की जान
बचाने के लिए किसी भी तरह
की राहत नही भेजी गयी।
गोविंदघाट-हेमकुंड से लौटकर आये
पीपलकोटी के पशु
प्रेमी संस्था आगाज फेडरेशन और
पी.एफए के कार्यकर्ताओं ने
बताया कि गोविंदघाट में
नदी पार से घांघरिया में 1050
घोड़े-खच्चर फंसे हुए हैं।
गोविंदघाट में नदी के निकट
लगभग 350 घोड़े-खच्चर चारे के
लिए तड़प रहे हैं। संस्था के
सदस्यों ने नदी के निकट लगभग
350 घोड़े-खच्चरों का उपचार
किया। उन्होंने कहा कि पुल्रा में
5 खच्चर मरे हुए दिखायी दिये
और साथ्ज्ञ ही एक बछिया व
एक गाय चट्टान से गिरकर
बुरी तरह से घायल है। घाटी में एक
परिवार के तीन सदस्य और 2
खच्चर लक्ष्मण गंगा में बह गये और
उनका कोई पता नहीं है। कई
घोड़े-खच्चर भूख के चलते चारे
की तलाश में पहाड़ की ओर गये
और वहां से गिरकर मर गये
अथवा घायल हो गये।
पी.एफए देहरादून तथा आगाज
फेडरेशन ने प्रमुख सचिव पशुपालन
से गोविंदघाट में अविलंब पुल
बनाने की मांग की है। उन्होंने
कहा कि घाटी में अधिकतर
घोड़े-खच्चर महज 2-3 दिन
ही बिना चारे के रह सकते हैं और
मरने पर वह क्षेत्र में
महामारी फैलाकर एक नया संकट
खड़ा कर सकते हैं। घोड़े खच्चरों के
मालिकों का कहना है कि उन्हें
सरकार की ओर से कोई मद्द
नही मिल रही है और टैक्स लेने
वाले जिला पंचायत ने भी आंखे
फेर ली है।
पशुपालन विभाग की ओर से
अभी तक किसी भी टीम ने
हेमकुंड घाटी का रूख
नही किया है। पशुपालन विभाग
की निष्क्रियता का प्रमाण
इस बात से लगाया जा सकता है
कि बल्दौड़ा नामक स्थान पर
सड़क पर घोड़े-खच्चरों के लिए
चारे के कुछ कट्टे कई दिनों से
सड़क पर पड़े हैं,लेकिन उन्हें
आपदा स्थल की ओर ले जाने के
लिए कोई कदम नही उठाये गये।
